नागा साधु (Naga Sadhu)
त्याग, तपस्या और आध्यात्म का प्रतीक
मोक्ष की प्राप्ति, सनातन धर्म की रक्षा और जगत कल्याण के भाव से अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले नागा दिगंबर साधुओं को शत शत नमन।
हर 12 वर्ष के अंतराल में कुंभ के दौरन जब ये नागा संन्यासी अपने अखाड़ों, आश्रमों, हिमालय की कंदराओं और गुफ़ाओं से बाहर निकलते हैं तो दुनिया की नजरें चकित होकर इन्हें निहारते रहते हैं।
नग्न शरीर, सिर पर जटा, माथे पर चंदन, बदन पर भस्म, गले और बाह में रुद्राक्ष की माला, हाथ में धारण किये कमंडल, चिमटा, शंख, तलवार, त्रिशूल या गदा। लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से ही ये प्रश्न उत्पन्न होते हैं, क्या आज के आधुनिक युग में ऐसा जीवन जीना संभव है? शिव भक्त नागा साधु स्वतः ही इसके उत्तर भी हैं और जीता जागता सबुत भी। आइए हम नागा साधुओं के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
जीवनशैली और साधना (Lifestyle & Practices)
नागा साधु शैव परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं। वे आम जनजीवन से दूर हिमालय की गुफाओं, आश्रमों या आखाड़ों में रहते हैं। यहीं वे योग और साधना करते हैं।
नागा साधुओं का जीवन अन्य साधुओं की अपेक्षा ज्यादा कठिन होता है। वे वर्फिले पहाड़ों पर भी नग्न अवस्था में ही साधना करते हैं। उन्हें अत्यंत अनुशासित रहकर कठिन ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। सुबह उठकर दिन की शुरुआत साधना से करते हैं, दिन में एक बार भोजन और फिर साधना में लीन हो जाते हैं।
पुरुष नागा साधुओं के अलावा महिला और किन्नर नागा साधु भी होते हैं। पुरुष नागा साधु सार्वजनिक तौर पर नग्न रह सकते हैं लेकिन महिला नागा साध्वियों (नागिनों) को बिना सिला हुआ एक गेरुआ वस्त्र पहनने की इजाजत होती है।
नागा साधु बनने की प्रक्रिया में ही उन्हें जीवित रहते हुए स्वयं का पिंडदान करना होता है। यह उनके सांसारिक जीवन से मुक्त होने का प्रतीक माना जाता है।
इतिहास और उत्पत्ति (History & Origin)
नागा बाबाओं का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसका प्रमाण सिंधु घाटी में मोहनजोदड़ो की खुदाई में निकले सिक्को में मुद्रित जटाधारियों से मिलते हैं।
ये तो सभी जानते हैं कि भारत सोने की चिड़ियां थीं। इसी वजह से प्राचीन समय में विदेशी लूटेरों ने कई बार आक्रमण किया। आक्रमणकारियों के द्वार जब धार्मिक स्थलों (मठों और मंदिरों) के खजानों (संपत्तियों) को भी लूटा जाने लगा तथा धर्म विश्वासियों (श्रद्धालुओं) को भी प्रताड़ित किया जाने लगा तब आदिगुरु शंकराचार्य का सब्र टूट गया। उन्हें आभास हो गया कि केवल अध्यात्म-ज्ञान और साधना से हर चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता। उन्होंने सनातन धर्म की जड़ों को मज़बूती प्रदान करने और उसकी रक्षा के लिए युवा संन्यासियों को प्रेरित किया कि वे अध्यात्म-ज्ञान के साथ-साथ शरीरिक रूप से सुदृढ बनें और शस्त्र चालन में निपुणता हासिल करें। इसी दिशा में उन्होंने अखाड़ों का निर्माण कराया जहां व्यायाम तकनीक और शस्त्र हथियार या संचालन का प्रशिक्षण दिया जाने लगा। उसी समय से अखड़ों की परंपरा शुरू हुई जो आज भी जारी है। इन अखाड़ों में आज के सैन्य प्रशिक्षण (Military Training) से भी अधिक कड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है और साधना के बाद तब जाकर ये युवा संन्यासी नागा साधु बनते हैं। प्रयाग के कुंभ में नागा साधु बनने वाले को नागा, उज्जैन में खूनी नागा, हरिद्वार में बर्फानी नागा और नासिक में खिचड़िया नागा कहा जाता है।